हम पेड़ नहीं कटने देंगे

तुम्हारे बाप की ये जागीर नहीं,
ये बात तुम्हें समझायेंगे।
तुम लाख नज़रअंदाज़ करों,
हम लौट के वापिस आएंगे।

प्रकृति के आशिक़ हैं हम,
ये बात नहीं भूलने देंगे।
चाहें प्राण जाए या शीश कटें,
हम पेड़ नहीं कटने देंगे।

ऑक्सीजन की कीमत तुम,
नागपुरियों को क्या बताओगे?
एक झलक भी जिनकी न देख सकें,
क्या शक्ल उन्हें दिखाओगे?

जिस कुर्सी से हैं अकड़ तुम्हारी,
उस कुर्सी को हम सरका देंगे।
चाहें प्राण जाएं या शीश कटें,
हम पेड़ नहीं कटने देंगे।

आँचल में जिसकी बैठे हैं,
उसकी इज़्ज़त नहीं लूटने देंगे।
आशिक़ इस हरियाली के,
हर कीमत पर इश्क़ निभाएंगे।

आ जाये पास जो मेहबूब के,
वो हाथ नहीं रहने देंगे।
चाहें प्राण जाए या शीश कटें,
हम पेड़ नहीं कटने देंगे।
-ऋत्वीक

सत्यनामा

आन, बान और शान नहीं हैं,
सच का जहा सम्मान नहीं हैं।

झूठ को प्यार अपार देते हैं,
सच कहों ललकार देते हैं,
झूठों को सीने से लगा कर,
सच्चों को धिक्कार देते हैं।

सज्जनों में ऐसे जान नहीं हैं,
सच का जहा सम्मान नहीं हैं।

आशा का आधार हैं सच,
वीरों का श्रृंगार हैं सच,
फूलों के इन बाज़ारों में,
काँटों का व्यापार हैं सच।

तलवार तो हैं पर म्यान नहीं हैं,
सच का जहा सम्मान नहीं हैं।

मानवता का मान हैं सच,
कुदरत का सम्मान हैं सच,
कौव्वों के इस कोलाहल में,
कोयल सी एक तान हैं सच।

आँखें तो हैं पर कान नहीं हैं,
सच का जहा सम्मान नहीं हैं।
-ऋत्वीक

अपूर्व

अपूर्व ह्या क्षणाला मनसोक्त जगून घ्यावे,
उद्याच्या चिंतेला क्षणभर विसरून जावे.

सोडून भीती, तोडून मनाचे बंध सारे,
एका अनोळखी वाटेवर भटकून यावे.

वाटेवर मनाच्या असेल विरोध कितीही,
प्रवाहाच्या विपरीत कधी पोहून बघावे.

दुःखाच्या वादळामध्ये खचून न जाता,
घेऊन आशेचा आसरा खंबीर असावे.

आयुष्याच्या धावपळीत धावता धावता,
ओंजळभर मोगरे सवडीने हुंगून पहावे.

छत्री-रेनकोट तर आवश्यक आहेच पण,
पावसात पहिल्या बिनधास्त भिजून घ्यावे.
-ऋत्वीक

देख लेना…

होगा सवेरा नया देख लेना,
होगा हासिल जहां देख लेना।

तिलमिलाती धूप से जलती जमीं,
बारिश से भिगेगी देख लेना।
ठंडी हवा लाएगी महक मिट्टी की,
किसान मुस्कुराएगा देख लेना।

होगा एक शहर तेरा अपना भी,
कुछ अपने भी होंगे देख लेना।
ये जो रिसता हुआ मकान है ना,
यहीं एक महल होगा देख लेना।

कोई सुननेवाला तेरा भी होगा,
होगी क़बूल दुआ देख लेना।
रात के सन्नाटे जब बोल उठेंगे,
सच हो जाएंगे सपने देख लेना।

महकते मोगरों के करीब जाकर,
कुछ फूलों को जेब मे रख लेना।
वो जो कल बिछड़ा यार हैं ना,
बस आता ही होगा देख लेना।

होगा सवेरा नया देख लेना,
होगा हासिल जहां देख लेना।
-ऋत्वीक

तूफान बाकी हैं

कुछ धूप, कुछ छाँव, कुछ तूफान बाकी हैं,
अभी ज़िन्दगी में कई इम्तेहान बाकी हैं

जीतनेवालें अपनी जीत पर गुरुर ना कर
जीत ली ज़मीन तो ये आसमान बाकी हैं

जब तक तू नहीं मानेगा हार नहीं होगी
कोशिशें जारी रख अभी जान बाकी हैं

कर शब्दों का उपयोग ज़रा संभल कर
तलवार तो बना ली अब म्यान बाकी हैं

कदम बढानेसे फासलें कम हुआ करते हैं
मिटाना मंज़िल पर जो थकान बाकी हैं

किस्मत की मार से ना होना तू मायूस
तू आज़ाद परिंदा हैं तेरी उड़ान बाकी हैं
-ऋत्वीक

जश्न

हमें तोड़नेवाले आज भगवान बने बैठे हैं,
कल के याचक आज धनवान बने बैठे हैं।

जो टूट कर बिखर गए उनमे नहीं शामिल,
हम टूटा मकां जलाकर हाथ सेकने बैठे हैं।

कौन था सितमगर कहाँ से आया मत पूछों,
हम अपनी बर्बादियों का जश्न मनाने बैठे हैं।

डर नहीं हमें इन उंगलियों से खून बहने का,
बिखरे टुकड़े जोड़कर तस्वीर बनाने बैठे हैं।

बुझी वो आग जिससे हमारा जहां रोशन था,
उम्मीद की झुठी चादर से सर्दी भगाने बैठे हैं।

तमाचों से किस्मत के हम हुए नहीं मायूस,
जहाँ डूबी कश्ती वहीं मछली पकड़ने बैठे हैं।
-ऋत्वीक

शोले हैं इनमें…

शोले हैं इनमें, नज़रों से नज़र मिला कर तो देख ले,
रख आईना करीब, तू ज़रा मुस्कुरा कर तो देख ले।

ना होगी फिर गुलशन में पतझड़ और बहारें ऐसी,
हैं मज़ा हर पल में, तू जरा आज़मा कर तो देख ले।

क्यों रोता हैं आयी जो ग़मों की शाम बेबसी लेकर,
निकलेगा सूरज नया, थोड़ा कर के सबर तो देख ले।

गर्मियों में आग उगलता सूरज जाड़े में सहलायेगा,
धूप हैं तो छांव भी होगी, ज़रा ठहर कर तो देख ले।

हैं इसके अलग जलवें कदम कदम पर मेरे दोस्त,
थमने से पहले एक कदम और बढ़ाकर तो देख ले।

चलते रहने से मंज़िलें कुछ करीब आया करती हैं,
ठहरे हुए मुसाफिर, जरा नज़र उठा कर तो देख ले।
-ऋत्वीक

न्याय पर सबका हक़ होना चाहिए

अत्त्याचार की हर चीख को,

कोई सुननेवाला होना चाहिए,

भूख से तड़पते जिस्म को,

कोई पूछनेवाला होना चाहिए।

तोड़कर सारे बांध बेबाक सा,

आँख से आंसू निकलना चाहिए,

ज़मीं को थोड़ा हल्का करने अब,

आसमां नीचे उतरना चाहिए।

बोहोत हुआ ये खौफ़-ओ-सन्नाटा,

अब ज़ख़्मी शेर ये गुर्राना चाहिए,

क्यों रोकते हो आवाज़ अपनी,

अब एक शोर बुलंद होना चाहिए।

हो काला गोरा या मोटा पतला,

हर इंसान समान होना चाहिए,

जलाकर सारी ऊंच-नीचता,

नफरत को धुंए में उड़ना चाहिए।

सागर से गहरी या चट्टान से बुलंद,

दुश्मनी अन्याय से होनी चाहिए,

धर्म, जात, मज़हब, रंग, सरहद,

या अब कुछ नया चाहिए?

कितना गलत हैं कितना सही,

हिसाब बराबर होना चाहिए,

इस जहाँ में अगर न्याय हैं,

तो उसे हर पल होना चाहिए।

पानी की तलाश में भटके प्यासे,

तो किसी भूखें पेट को खाना चाहिए,

जब तक हैं ये तस्वीर हिन्द की,

ना चैन की नींद आना चाहिए।

बेखौफ़ होना चाहिए,

बेबाक होना चाहिए,

न्याय पर सबका,

हक़ होना चाहिए।

कभी कभी इंसानियत को भी,

खड़ा कटघरे में होना चाहिए,

इंसान के प्रकृति पर अत्याचार का भी,

मामला विचाराधीन होना चाहिए।

मुकदमा कटनेवाले हर पेड़ का,

अदालत में चलना चाहिए,

सालों का इंतेज़ार हो भले ही,

कुदरत के साथ भी न्याय होना चाहिए।

जान है हर जिस चीज में,

उसे नाज़ होना चाहिए,

अमीरी गरीबी से परे,

बस न्याय होना चाहिए।

सच को दबाने की हर साज़िश को,

सरासर नाकाम होना चाहिए,

कोशिशें लाख हो छुपाने की,

आईना साफ चमकना चाहिए।

न्याय वो नहीं हैं जो किसी,

एक को तड़पता छोड़ दे,

उसके दामन में तो ये,

सारा ब्रह्मांड होना चाहिए।

तड़पता हैं तो तड़पने दो,

इस सूरत को बदलना चाहिए,

ज़ुल्म पर चुप रहना भी,

अन्याय होना चाहिए।

इंसाफ की खौलती मशाल से,

हर कोना जगमगाना चाहिए,

कपकपाये बलात्कारी, कातिल, लुटेरे,

हमे वो बेख़ौफ़ ज़माना चाहिए।

बेखौफ़ होना चाहिए ,

बेबाक होना चाहिए,

न्याय पर सबका,

हक़ होना चाहिए।

-ऋत्वीक

तन्हा नहीं मैं…

तन्हा नहीं मैं,
मेरे साथ होती हैं हर पल,
चीटियां बोहोत सारी,
मैं कुछ भी खाऊ,
वे आ जाती हैं हाथ बटाने,
किसी दोस्त की तरह,
अनुशासित, कतार में!

कुछ चूहें भी हैं,
बड़े शर्मीले!
मुझे देखते ही भाग खड़े होते हैं,
और अनपेक्षित दर्शन देकर,
बड़ा डराते हैं,
पर प्यार करते हैं।
चुम लेते हैं कदम,
कभी जब ध्यान न हो।

शाम होते ही,
आते हैं कुछ मेहमान!
चराग़ों के इर्द गिर्द,
झूमते हैं खुशी से,
प्रेमियों से मिलने सांझ में,
न जाने कहाँ से आते हैं…
और न जाने कहाँ को जाते हैं…

इनके व्यतिरिक्त,
गर्मियों की वो शुष्क हवा,
आ मिलती हैं गले से,
क्षण प्रतिक्षण,
कहती हैं तन्हा होंगे तेरे दुश्मन!
कुदरत के आशिक़ों की तो,
सारी कायनात मेहबूब होती हैं…

-ऋत्वीक

प्रतिशोध

इन श्रमिको की पीड़ाओं का वहां कोई तो श्रोता होगा,
उचित समय आनेपर देखना अवश्य प्रतिशोध होगा।

पैरों के छालों से निकली हर आह पतन का कारण,
और प्यासे अधरों के श्राप से चारो ओर अनर्थ होगा।

गिरेगी ये पढ़ी लिखी सरकारें अनपढ़ों की बद्दुआ से,
कारखाने जब बंद होंगे तो कोहराम चारो ओर होगा।

श्रमजीवियों के श्रम से खड़े हैं ये सारे महल हमारे,
याद करेंगे पछतायेंगे और ग्लानि का ना अंत होगा।

विदेश से लौटनेवालों के लिए विशेष बड़े प्रबंध हुए,
थके भूखों को न जाने कितने वाहनों ने कुचला होगा।

आक्रन्दन करती लज्जित कलम से निकली ये स्याही हैं,
न्याय भले ही हो ना हो किन्तु प्रतिशोध अवश्य होगा।
-ऋत्वीक

This site is a compilation of my literary works in Marathi, Hindi and English.

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