तूफान बाकी हैं

कुछ धूप, कुछ छाँव, कुछ तूफान बाकी हैं,
अभी ज़िन्दगी में कई इम्तेहान बाकी हैं

जीतनेवालें अपनी जीत पर गुरुर ना कर
जीत ली ज़मीन तो ये आसमान बाकी हैं

जब तक तू नहीं मानेगा हार नहीं होगी
कोशिशें जारी रख अभी जान बाकी हैं

कर शब्दों का उपयोग ज़रा संभल कर
तलवार तो बना ली अब म्यान बाकी हैं

कदम बढानेसे फासलें कम हुआ करते हैं
मिटाना मंज़िल पर जो थकान बाकी हैं

किस्मत की मार से ना होना तू मायूस
तू आज़ाद परिंदा हैं तेरी उड़ान बाकी हैं
-ऋत्वीक

जश्न

हमें तोड़नेवाले आज भगवान बने बैठे हैं,
कल के याचक आज धनवान बने बैठे हैं।

जो टूट कर बिखर गए उनमे नहीं शामिल,
हम टूटा मकां जलाकर हाथ सेकने बैठे हैं।

कौन था सितमगर कहाँ से आया मत पूछों,
हम अपनी बर्बादियों का जश्न मनाने बैठे हैं।

डर नहीं हमें इन उंगलियों से खून बहने का,
बिखरे टुकड़े जोड़कर तस्वीर बनाने बैठे हैं।

बुझी वो आग जिससे हमारा जहां रोशन था,
उम्मीद की झुठी चादर से सर्दी भगाने बैठे हैं।

तमाचों से किस्मत के हम हुए नहीं मायूस,
जहाँ डूबी कश्ती वहीं मछली पकड़ने बैठे हैं।
-ऋत्वीक

शोले हैं इनमें…

शोले हैं इनमें, नज़रों से नज़र मिला कर तो देख ले,
रख आईना करीब, तू ज़रा मुस्कुरा कर तो देख ले।

ना होगी फिर गुलशन में पतझड़ और बहारें ऐसी,
हैं मज़ा हर पल में, तू जरा आज़मा कर तो देख ले।

क्यों रोता हैं आयी जो ग़मों की शाम बेबसी लेकर,
निकलेगा सूरज नया, थोड़ा कर के सबर तो देख ले।

गर्मियों में आग उगलता सूरज जाड़े में सहलायेगा,
धूप हैं तो छांव भी होगी, ज़रा ठहर कर तो देख ले।

हैं इसके अलग जलवें कदम कदम पर मेरे दोस्त,
थमने से पहले एक कदम और बढ़ाकर तो देख ले।

चलते रहने से मंज़िलें कुछ करीब आया करती हैं,
ठहरे हुए मुसाफिर, जरा नज़र उठा कर तो देख ले।
-ऋत्वीक

न्याय पर सबका हक़ होना चाहिए

अत्त्याचार की हर चीख को,

कोई सुननेवाला होना चाहिए,

भूख से तड़पते जिस्म को,

कोई पूछनेवाला होना चाहिए।

तोड़कर सारे बांध बेबाक सा,

आँख से आंसू निकलना चाहिए,

ज़मीं को थोड़ा हल्का करने अब,

आसमां नीचे उतरना चाहिए।

बोहोत हुआ ये खौफ़-ओ-सन्नाटा,

अब ज़ख़्मी शेर ये गुर्राना चाहिए,

क्यों रोकते हो आवाज़ अपनी,

अब एक शोर बुलंद होना चाहिए।

हो काला गोरा या मोटा पतला,

हर इंसान समान होना चाहिए,

जलाकर सारी ऊंच-नीचता,

नफरत को धुंए में उड़ना चाहिए।

सागर से गहरी या चट्टान से बुलंद,

दुश्मनी अन्याय से होनी चाहिए,

धर्म, जात, मज़हब, रंग, सरहद,

या अब कुछ नया चाहिए?

कितना गलत हैं कितना सही,

हिसाब बराबर होना चाहिए,

इस जहाँ में अगर न्याय हैं,

तो उसे हर पल होना चाहिए।

पानी की तलाश में भटके प्यासे,

तो किसी भूखें पेट को खाना चाहिए,

जब तक हैं ये तस्वीर हिन्द की,

ना चैन की नींद आना चाहिए।

बेखौफ़ होना चाहिए,

बेबाक होना चाहिए,

न्याय पर सबका,

हक़ होना चाहिए।

कभी कभी इंसानियत को भी,

खड़ा कटघरे में होना चाहिए,

इंसान के प्रकृति पर अत्याचार का भी,

मामला विचाराधीन होना चाहिए।

मुकदमा कटनेवाले हर पेड़ का,

अदालत में चलना चाहिए,

सालों का इंतेज़ार हो भले ही,

कुदरत के साथ भी न्याय होना चाहिए।

जान है हर जिस चीज में,

उसे नाज़ होना चाहिए,

अमीरी गरीबी से परे,

बस न्याय होना चाहिए।

सच को दबाने की हर साज़िश को,

सरासर नाकाम होना चाहिए,

कोशिशें लाख हो छुपाने की,

आईना साफ चमकना चाहिए।

न्याय वो नहीं हैं जो किसी,

एक को तड़पता छोड़ दे,

उसके दामन में तो ये,

सारा ब्रह्मांड होना चाहिए।

तड़पता हैं तो तड़पने दो,

इस सूरत को बदलना चाहिए,

ज़ुल्म पर चुप रहना भी,

अन्याय होना चाहिए।

इंसाफ की खौलती मशाल से,

हर कोना जगमगाना चाहिए,

कपकपाये बलात्कारी, कातिल, लुटेरे,

हमे वो बेख़ौफ़ ज़माना चाहिए।

बेखौफ़ होना चाहिए ,

बेबाक होना चाहिए,

न्याय पर सबका,

हक़ होना चाहिए।

-ऋत्वीक

तन्हा नहीं मैं…

तन्हा नहीं मैं,
मेरे साथ होती हैं हर पल,
चीटियां बोहोत सारी,
मैं कुछ भी खाऊ,
वे आ जाती हैं हाथ बटाने,
किसी दोस्त की तरह,
अनुशासित, कतार में!

कुछ चूहें भी हैं,
बड़े शर्मीले!
मुझे देखते ही भाग खड़े होते हैं,
और अनपेक्षित दर्शन देकर,
बड़ा डराते हैं,
पर प्यार करते हैं।
चुम लेते हैं कदम,
कभी जब ध्यान न हो।

शाम होते ही,
आते हैं कुछ मेहमान!
चराग़ों के इर्द गिर्द,
झूमते हैं खुशी से,
प्रेमियों से मिलने सांझ में,
न जाने कहाँ से आते हैं…
और न जाने कहाँ को जाते हैं…

इनके व्यतिरिक्त,
गर्मियों की वो शुष्क हवा,
आ मिलती हैं गले से,
क्षण प्रतिक्षण,
कहती हैं तन्हा होंगे तेरे दुश्मन!
कुदरत के आशिक़ों की तो,
सारी कायनात मेहबूब होती हैं…

-ऋत्वीक

प्रतिशोध

इन श्रमिको की पीड़ाओं का वहां कोई तो श्रोता होगा,
उचित समय आनेपर देखना अवश्य प्रतिशोध होगा।

पैरों के छालों से निकली हर आह पतन का कारण,
और प्यासे अधरों के श्राप से चारो ओर अनर्थ होगा।

गिरेगी ये पढ़ी लिखी सरकारें अनपढ़ों की बद्दुआ से,
कारखाने जब बंद होंगे तो कोहराम चारो ओर होगा।

श्रमजीवियों के श्रम से खड़े हैं ये सारे महल हमारे,
याद करेंगे पछतायेंगे और ग्लानि का ना अंत होगा।

विदेश से लौटनेवालों के लिए विशेष बड़े प्रबंध हुए,
थके भूखों को न जाने कितने वाहनों ने कुचला होगा।

आक्रन्दन करती लज्जित कलम से निकली ये स्याही हैं,
न्याय भले ही हो ना हो किन्तु प्रतिशोध अवश्य होगा।
-ऋत्वीक

अदृश्य

हस्ती खिलखिलाती महफिलों में,
सजती संवरती उन बेलाओं में,
एकाकी और अदृश्य कुछ लोग हैं,
कहीं आपके और मेरे दरमियां में।

न जाने किस कारण से बेज़ार हैं,
न जाने किस जुर्म के गुनहगार हैं,
भँवरे भी नहीं जाते उन फूलों पर,
सिर्फ दवाइयों से जिनका गुज़ार हैं।

ज्यादा हसी आ जाए तो दिक्कत,
ज्यादा रोना भी हैं एक दिक्कत,
सिर्फ ज्यादा बातें करना ही नहीं,
ज़्यादा चुप रहना भी हैं दिक्कत।

हाल किसीको बताये तो बताये कैसे,
जो दिल में हैं छुपा वो जताए कैसे,
बात बात पर judge करती दुनिया में,
आम इंसान की ज़िन्दगी बिताये कैसे।

इन्हें समझनें की कोशिश तो हों,
कितने दर्द छुपाये हैं ज़ाहिर तो हों,
दुनिया दूर रहना चाहती हैं जिनसे,
उनकी थोड़ी ही सहीं बातें तो हों।

आओं के अब बांध छोड़ दिए जाए,
ऊंचे पहाड़ों से कोई नदी निकाल लाए,
हौंसलों के पंख बांधे कुछ परिंदों को,
गुलाब बनती कोई कली टूट ना जाए।
-ऋत्वीक

#mentalhealthawarenessmonth

कलाम-ए-शहादत

तुम्हारी शहादत को हमेशा याद रखेंगे हम,
सम्मान ये तुम्हारे लिए ना होगा कभी कम।

सींचा इस चमन को अपनें प्राणों से हर दम,
नही भूलेंगे तुम्हें बहारों में ये खाते है कसम।

इंसानों से लड़ने के लिए हमने बहोत बनाये बम,
पर एक विषाणु से हार रहें सर्वशक्तिशाली हम।

चेतावनियों के बाद भी नहीं रोके हमने कदम,
अब इन शहादतों पर सिर्फ हो रहीं हैं आँखें नम।

न जाने कितने बार हुई कुदरत की हत्या निर्मम,
खुद को खुद का दुश्मन साबित कर चुके हैं हम।

बोझ बड़ा ही भारी छोड़ गए हो कर्मसाथी तुम,
थम गए अब जो निकले थे हमे बचाने कदम।

अनाथों के ज़ख्मों पर काश होते शब्द मरहम,
पर ये दुख तो होता हैं ज्वालामुखी विस्फोटसम।

जानकार कहते हैं लिखने से कम हो जाएंगे ग़म,
बस इसी उम्मीद में ऋत्वीक चला रहा हैं कलम।

बहोत बड़ी कीमत देकर मिला हैं ज्ञान दुर्गम,
सारे मानवी मूल्यों में त्याग ही हैं सर्वोच्चतम।
-ऋत्वीक

वर्दीमधले देव

“वर्दी चढवून निरोप घेतात लपवून ओल्या कडा,
रोज लढवैये निघतात जिंकण्या मानवतेचा लढा!”

त्यांच्या जवळपास हजर असण्याने कुणा न वाटे भेव,
सणावारी रविवारी बंदोबस्तात पाहिले मी वर्दीमधले देव.

रस्त्या-रस्त्यात, गल्ली बोळात, नुसते संक्रमणाचे भेव,
तरीपण आमच्या संरक्षणार्थ हजर आहेत वर्दीमधले देव.

रोगा विरुद्ध एक युद्ध आणि दुसरे निष्काळजी माणसांविरुद्ध,
mask, sanitizer व शस्त्रसज्ज लढतायत वर्दीमधले देव.

वीतभर पगारात संसार चालवून आपल्याला त्यांनी रक्षण दिले,
त्यांनाच दगडं मारतोय, गोळ्या मारतोय, काहीतरी लाज ठेव!

त्यांचे व परिवाराचे हाल पाहून चुकतो काळजाचा ठोका,
पगार कमी, सुविधा पण नाही, चला फोडू या प्रश्नांना पेव.

जीव धोक्यात टाकण्याची मला सांगा आहे तरी किंमत काय?
ज्याचे उतराई होणे अशक्य किंबहुना त्यालाच म्हणतात देव!

युद्धस्थितीत घर काय, जेवण काय आणि काय आराम?
नैवेद्य दाखवतो ना देवाला कधी त्याला पण म्हणूया जेव!
-ऋत्वीक

It’s okay

It’s okay,
To get all scarry and broken,
And being no more able to thrive,
It adapts you for what you’re chosen,
For that’s what makes you Alive!

It’s okay,
To get underestimated often,
It all happens to add a tinge of lime,
You might not give out the best action,
If you feel your best everytime.

It’s okay,
To forgive the erring person,
Holding on causes happiness to deprive,
And do spare the pillows from being soaken,
It gets more tense the deeper you dive.

It’s okay,
To lose a gutsily earned domain,
Begin with one more attempt to revive,
No matter how frequently honey is stolen,
Bees never fail to fill the hive.

It’s okay,
To be a laughing stock while tryin,
Depart resolutely with an aim to arrive,
Remember Manjhi who dug a mountain?
People laughed hard seeing him strive.

It’s okay,
To speak what was never spoken,
Discover and pursue the faith you have,
If you are ever in a need of inspiration,
The marvels of nature are always live!

Believe me it’s okay,
To know the standings to be shaken,
And witness the worst situations by eye,
River may wreak havoc with every flow revision,
It is better known to make a civilisation survive.
-Rutvik.

This site is a compilation of my literary works in Marathi, Hindi and English.

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